Sunday, March 1, 2026
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सेतु विभाग को नहीं मिल रही निर्माण के लिए जमीन

सेतु विभाग को नहीं मिल रही निर्माण के लिए जमीन, 9 हजार 8 सौ 13 लाख के 15 निर्माण कार्य भूमि अधिग्रहण के अभाव में पेंडिंग

रायगढ़/सेतु निर्माण विभाग अंतर्गत रायगढ़ एवं सारंगढ़ जिले में 9 हजार 8 सौ 13 लाख रुपए की लागत के दर्जनभर से अधिक पुल पुलिया निर्माण एवं पहुंच मार्ग के कार्य राशि स्वीकृति के बावजूद भी भूमि अधिग्रहण के चक्कर में आरंभ नहीं हो सके है।बताया जा रहा है कि अधिग्रहण को लेकर कई स्थानों में मुआवजे का आर्च फंस रहा है।जहां ऐच्छिक तौर पर भूमि अधिग्रहण की गई है। वहां तो विभाग द्वारा टेंडर प्रक्रिया जारी कर दी गई।परन्तु अनिवार्य भूमि अधिग्रहण को लेकर मामला अटकता नजर आ रहा है।हालांकि इस प्रक्रिया के तहत सार्वजनिक हित को देखते हुए शान द्वारा भूमि का अधिग्रहण तो किया ही जाएगा।परन्तु इसके नियम कायदों को तहत प्रक्रिया पूरी करने सालभर से 14 माह का समय भी लग सकता है।जिसकी वजह से स्वीकृति के बावजूद भी दर्जनभर से अधिक विकास कार्यों को प्रारंभ होने में ही सालभर का समय लग सकता है।

स्वीकृति के सालभर भी नहीं हुआ कार्य का श्रीगणेश

गौरतलब हो कि लोक निर्माण विभाग की सेतु संभाग के कार्यक्षेत्र अंतर्गत रायगढ़ एवं सारंगढ़ बिलाईगढ़ जिला भी शामिल है।जिनमें 9 हजार 8 सौ 13 लाख के 15 कार्य के लिए शासन द्वारा राशि स्वीकृति कर हरि झंडी तो प्रदान कर दी गई।परन्तु भूमि अधिग्रहण के अड़ंगा की वजह से कार्य स्वीकृति के महीनों बाद भी प्रारंभ नहीं किया जा सका है।इन कार्यों की फेहरिस्त में देखे तो लैलूंगा पोतरा मार्ग के खातून नदी पर 546 लाख की लागत से निर्मित होने वाला पुल स्वीकृति के लगभग सालभर बाद भी शुरू नहीं किया जा सका।इसी क्रम में सपनई नाका पुल एवं एप्रोच रोड निर्माण, लोइंग नाला पर पुल निर्माण,गोवर्धनपुर पुल, बालसमुंद नाला पर पुल निर्माण,चांदनी चौक पुल सहित इंदिरा नगर पुल प्रमुख रूप से शामिल है।इनमें दस कार्यों के लिए 90 प्रतिशत की भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया अब भी शेष है।तो वही 5 निर्माण कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया उपरांत निविदा की कार्यवाही प्रारंभ कर दी गई है।

अधिग्रहण की लंबी प्रक्रिया

निर्माण कार्यों के प्रारंभ में राशि स्वीकृति के बाद भी सबसे बड़ी रुकावट भूमि अधिग्रहण की होती है।जो संबंधित विभाग के अधिकारियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होती है।ऐच्छिक अधिग्रहण में जहां आपसी तालमेल बनाते हुए मुआवजे का निपटारा कर किया जाता है।वही मामला अनिवार्य भूमि अधिग्रहण में आकर अटकता है।हालांकि आमजन के हित को ध्यान रख जिला प्रशासन भूमि का अधिग्रहण तो अनिवार्य रुप से करेगी।चाहे इसमें भू स्वामी की मर्जी हो अथवा न हो।परन्तु इस प्रक्रिया में लगने वाला समय विकास कार्यों पर अड़ंगा है।जिसकी। वजह से न केवल कार्य की गति पर ब्रेक लगता है।बल्कि निर्धारित अवधि उपरांत निर्माण प्रारंभ करने से निश्चित तौर पर इसकी लागत में भी बढ़ोतरी होती है।हालांकि अधिग्रहण प्रभावितों को शासन की निर्धारित दर से मुआवजा एवं पुनर्वास नीति का लाभ तो दिया जाता है।बावजूद इसके मुआवजे को लेकर विरोध निरंतर देखने को मिलता है।

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