गुनाह सिद्ध होने से पहले 824 बंदी गुजार रहे बेबसी का जीवन
837 में केवल 13 कैदी ही हैं सजायाफ्ता, व्यवस्था दुरूस्त करने में आती हैं व्यावहारिक दिक्कतें
जनकर्म न्यूज
रायगढ़। जिला जेल में इन दिनों मात्र 13 सजायाफ्ता कैदी हैं, तो 824 विचाराधीन बंदी हैं जबकि जिला जेल की क्षमता मात्र 695 बंदियों की है। इसे व्यवस्था की लाचारी कहें या फिर कार्यवाही में लेट लतीफी की गुनाह सिद्ध होने से पहले केवल शक के बिनाह पर गिरफ्तार हजारों लोग सलाखों के पीछे बेबस जीवन गुजारने को मजबूर हैं। वर्षों जेल में गुजारने के बाद यदि ऐसे विचाराधीन कैदी बरी भी हो जाते हैं। तो कैद में गुजारे इनके कष्टदायक पल का कोई वाजिब मुआवजा तक देने का प्रावधान नहीं है। इसी लाचारी का खामियाजा जिला जेल में बंद ऐसे सैकड़ों कैदी भुगत रहे हैं, जिनसे जुड़े प्रकरणों में यदि समय पर फैसला हो जाए तो समाज में बहुत कुछ बदल सकता है। अन्यथा कहीं व्यवस्था की मार तो कहीं सामाजिक लाचारी विचाराधीन आरोपों के मामलों में पूर्वाग्रह व गुनाह की वजह बन रही है।

बोझ से वर्दीधारी भी परेशान –
ऐसा नहीं है कि केवल शक के बिनाह पर गुनाहगार बन कैदखाने में जिंदगी काटने के के मजबूरी का दंश केवल विचाराधीन बंदियों की ही है, बल्कि जेल में इनकी सुरक्षा कर रहे कर्मचारियों को भी उतनी ही दिक्कतें झेलनी पड़ती है। स्टाफ कम होने की वजह से अतिरिक्त डयूटी का बोझ, अवकाश की कमी व अतिरिक्त बल से जेल जैसे संवेदनशील स्थान में व्यवस्था दुरूस्त रखने में व्यावहारिक दिक्कतों को बर्दाश्त करना सरल नहीं है और वह भी उस जेल में जहां क्षमता से अधिक कैदी मौजूद हैं।
गम भुलाने का वैकल्पिक व्यवस्था- जेल में बंद विचाराधीन कैदी यूं तो अपनी जिंदगी के मूल्यवान क्षणों को व्यर्थ में जाता देख अवसादग्रस्त रहते हैं, किंतु जब व्याकुल मनोस्थिति बढ़ने लगती है तो इनके लिए जेल में उपलब्ध वैकल्पिक मनोरंजन राहत का काम करते हैं। टी. व्ही. कैरम, शतरंज, लूडो सहित कुछ साधन थोड़े समय तक आपस में बेबसी भुलाने का माध्यम बनते हैं।
जिम्मेदार कौंन ?
कानून के जानकार बताते हैं कि लंबित तथा देर से चले आ रहे मामलों को निपटाने के लिए आज से 25 वर्ष पहले सन 2001 में फास्ट ट्रेक कोर्ट का गठन किया गया था किंतु उसके बाद भी केवल जिला न्यायालयों व निचली अदालतों में 60 से 80 प्रतिशत से अधिक मामले लंबित है। अदालतों में कामकाज मैनुअली होता है। इस कारण केवल कागजी काम संभालने से ज्यादा जन बल की जरूरत पड़ती है। वहीं यदि यह सब कम्प्यूटराईज हो जाए तो समय के साथ न केवल शासकीय व्यय बचेगा बल्कि न्यायालयीन निर्णयों में शीघ्रता बढ़ेगी।
भोजन एवं सुरक्षा पर लाखों व्यय
जानकारी के मुताबिक जेल में रोजाना एक कैदी पर भोजन व्यय 85 रूपये का व्यय किया जाता है, इस हिसाब से जिला जेल में बंद 837 कैदियों के लिए माह भर में 21 लाख रूपये से ऊपर खाद्यान्न व्यय का बोझ है, जिसमें अधिकांश विचाराधीन बंदियों पर ही व्यय होता है। अन्यथा यह व्यय एक चौथाई से भी कम हो सकती है। इतना ही नहीं सैकड़ों की संख्या में क्षमता से अधिक बंदियों को संभालने तथा सुरक्षा के लिए भी जेल में वांछित बल नहीं है। जेल अधीक्षक के मुताबिक जेल में 57 कर्मियों की आवश्यकता है, किंतु 37 कर्मचारी ही कार्यरत हैं। 20 पद अभी तक खाली है। ऐसी परिस्थिति में यदि जेल में कोई अनहोनी अथवा अवांछित घटना घटित होती है तो तत्काल उसे नियंत्रित करना भी असंभव है। यद्यपि जेल की चारदीवारी में सुरक्षा के लिए करंट वायर का फैलाव तथा इलेक्टि्रक सायरन तथा 5 किमी. के दायरे में वॉच टॉवर क्षेत्र के दोनों ओर लगाए गए हैं। साथ ही आधा दर्जन होमगार्ड की भी सेवायें ली जा रही है। फिर भी यह सब जेल के आंतरिक माहौल को पूर्ण सुरक्षा का पुष्टि करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
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वर्जन
जेल में क्षमता से अधिक कैदी हैं, इनके मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं, विभाग में बल की कमी और प्रकरणों में विलंब से सुनवाई होने से सभी पक्षों को नुकसान होता है।
जी. एस. शौरी
जेल अधीक्षक, जिला जेल रायगढ़
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यदि कोई विचाराधीन कैदी अव्यवस्था से जेल में बंद है और यदि कोर्ट में कुछ सालों में बाइज्जत बरी हो जाता है, तो जेल में बिताये उस पल का कैदी को कोई मुआवजा शासन द्वारा देने का प्रावधान नहीं है। यदि वह चाहे तो एकमात्र विकल्प के रूप में शिकायतकर्ता के खिलाफ मानहानि का मामला दायर कर सकता है।
योगेश प्रधान
शासकीय अधिवक्ता
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