अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा…गुरु बाबा प्रियदर्शी के आध्यात्मिक वचनों से आया समाज में बदलाव
“बनोरा: आध्यात्मिक ज्ञान के दीपक से आलोकित हुआ मानव समाज – पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी की 3 दशक की तपस्या”
तीन दशक से बनोरा बनी बाबा प्रियदर्शी राम जी की तपोभूमि
रायगढ़ :-आषाढ़ माह की पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा का दिन गुरु शिष्य के मिलन के लिए निर्धारित माना जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन महान गुरु महर्षि वेद व्यास की जयंती भी है। सनातन परंपरा में आज का दिन उस रिश्ते के नाम है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। और ऐसे ही एक प्रकाश पुंज का नाम है अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट के संस्थापक पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी। तीन दशक पहले जब बाबा जी के चरण रज बनोरा की पावन धरती पर पड़े ,तब यहां अज्ञानता का अंधकार चप्पे चप्पे में पसरा हुआ था मूलभूत साधनों का अभाव था। रूढ़ी वादी परम्पराएं हावी थीं। तीन दशकों के सफर के दौरान गुरु चरण में संपर्क में रही बनोरा ज्ञान, प्रेम और संस्कार की त्रिवेणी बन गई। गुरु अथाह ज्ञान का खजाना होता है
गुरु दीपक है जो खुद जलकर समाज को आलोकित करता है। पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी का जीवन भी इसी दीपक की भांति समाज को आलोकित करते रहे है। पूज्य बाबा जी ने मानव जाति को इस तथ्य से अवगत कराया कि हर मनुष्य के अंदर असीमित शक्तियां निहित हैं। बस सोई हुई शक्तियों को जागृत करने की की जरूरत है। उसी तरह मानव जाति के सामने आपने यह आदर्श उदाहरण रखा कि सुख-दुख मनुष्य के मन की अवस्था है। जरूरत से ज्यादा साधनों पर निर्भरता ही मनुष्य के दुखों का कारण है। आपने बताया कि मनुष्य को जीवन के भटकाव से बचने के लिए जीवन का वास्तविक लक्ष्य समझना जरूरी है। पूज्य पाद बाबा प्रियदर्शी राम जी ने आध्यात्मिक ज्ञान के साथ व्यावहारिक ज्ञान को भी जरूरी बताया। धनाढ्य लोगों के समाज में बढ़ते प्रभाव के संबंध में आपका मानना रहा बताया कि सिर्फ धन कमाने वाला ही सफल नहीं होता। जो पीड़ित मानव की सेवा करता है, वही असली मायने में संतुष्ट और सफल है।नि:स्वार्थ सेवा मानवता को सही मायने में धर्म बताया।
अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा आज सिर्फ आश्रम नहीं, आध्यात्मिकता का विश्वविद्यालय बन गया है। यहां देश भर से हर धर्म,हर समाज, हर संप्रदाय के लोग ज्ञान लेने आते हैं। आपके संकल्प से पीड़ित मानव सेवा की धाराएं प्रवाहित हुईं। अघोरेश्वर भगवान राम विद्या मंदिर के जरिए हजारों बच्चों को शिक्षा मिली। डिग्री के पीछे भागने वाले छात्रों को आपने दृष्टि दी ताकि लक्ष्य हासिल करने के लिए उसका नजरिया निर्धारित हो सके। समाज को नशे की जकड़न से मुक्त करने के लिए निरंतर नशा उन्मूलन अभियान चलाया गया।अंतिम पंक्ति में खड़े, साधनविहीन लोगों तक मूलभूत आवश्यता शिक्षा और स्वास्थ्य पहुँचाई गईं। आपके संकल्प को पूरा करने आश्रम की हर शाखा पीड़ित मानव सेवा के धर्म का निर्वहन कर रही है। अघोर पंथ की भभूत सिर्फ राख नहीं बल्कि विनम्रता के साथ साथ मुक्ति का प्रतीक भी है। अघोर पंक्तियों के लिए यह भभूत भक्ति, मोक्ष, मुक्ति और आध्यात्मिक विकास का प्रतीक हैं। बाबा जी ने मानव जाति को अवगत कराया कि नश्वर शरीर अंत में भभूत ही बनता है। इसी सच्चाई को अपनाकर विनम्र और सरल जीवन जिया जा सकता है।आज वैचारिक मतभेद से समाज में कटुता बढ़ रही है। रिश्तों में प्रेम घट रहा है। सिर्फ व्यवसायिक शिक्षा को तवज्जो देने से विसंगतियां आ रही हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में बाबा प्रियदर्शी राम जी के आशीर्वचन और आध्यात्मिक ज्ञान समाज की बढ़ती खाई को पाटने का काम कर रहे हैं। आपने सिखाया जीवन में ऊंचाई हासिल करना ही काफी नहीं, उस ऊंचाई पर टिके रहना भी सीखना होगा।
अघोरेश्वर महाप्रभु का सूक्ष्म स्वरूप, उनके उद्देश्य और चमत्कृत शक्ति आज भी बनोरा में हर शिष्य को सहजता से महसूस होती है।गुरु पूर्णिमा पर बनोरा पावन स्थली पर पधारे सभी आगंतुकों को इस बात का एहसास है कि पूज्य बाबा जी की दुआ हर असाध्य समस्याओं के ईलाज का मर्ज़ है।आपका दिया ज्ञान मानव की मानव से जोड़ने में मदद गार साबित हो रहा है। पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन। आपके चरण रज सभी के माथे पर आशीर्वाद बनकर रहें।
“गुरु बिना ज्ञान कहां, बिना गुरु शिष्य अधूरा”
बनोरा अंधकार से प्रकाश तक गुरु-शिष्य की शाश्वत यात्रा का गवाह रहा है। शिष्यों के ज्ञान के दीपक बनोरा की परिधि में जले। आपके सान्निध्य मात्र से शिष्यों का जीवन संवर गया। अज्ञानता से बोध तक की स्वर्णिम यात्रा यही से शुरू हुई। गुरु कृपा से समाज को मार्गदर्शन मिल पाया।बाबा प्रियदर्शी की गुरु परंपरा ने शिष्यों को बताया कि सेवा ही धर्म और ज्ञान ही कर्म है। आपके शुभ आशीर्वाद से शिष्यों के संकल्प फलीभूत हुए । राष्ट्र निर्माण की कल्पना साकार हुई। गुरु-शिष्य परंपरा के निर्वहन के साथ साथ बनोरा पीड़ित मानव की सेवा में सार्थक साबित हुईं।बनोरा में गुरु परंपरा की मिसाल शिक्षा, संस्कार और समर्पण से सार्थक हुई। पूज्य बाबा जी के आध्यात्मिक संदेश वैचारिक कटुता के दौर में भेद भाव की खाई को पटाने में मदद गार साबित हुए। बतौर गुरु सच्ची शिक्षा के जरिए आपने डिग्री नहीं, बल्कि दृष्टि प्रदान की।
जब शिष्य कृतज्ञता वश झुकता है तभी समाज ऊपर उठता है। आपका अनुपम ज्ञान हम शिष्यों की पहचान है। आपके आध्यात्मिक प्रवचन से समाज की तकदीर बदली है। गुरु परम्परा का निर्वहन करते हुए एक दीप से हजार दीप जल उठे।




