Monday, March 2, 2026
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गड्ढों को पाटने में फ्लाईऐश का बढ़ता इस्तेमाल बना भविष्य का संकट

गड्ढों को पाटने में फ्लाईऐश का बढ़ता इस्तेमाल बना भविष्य का संकट

नेशनल हाईवे-49 बना डंपिंग का अघोषित ज़ोन, एनजीटी नियमों की उड़ रही धज्जियां

रायगढ़ /जिले में गड्ढों और निचली भूमि को समतल करने के नाम पर फ्लाईऐश का उपयोग तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इसका कम लागत वाला होना। मिट्टी, मुरुम या अन्य निर्माण सामग्रियों की तुलना में फ्लाईऐश उद्योगों से आसानी से और सस्ते दामों पर उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि ठेकेदारों और परिवहनकर्ताओं के लिए यह एक आसान और सस्ता विकल्प बन गया है।हालांकि, यह सस्ता समाधान आज भले ही सुविधाजनक लगे, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम बेहद घातक साबित हो सकते हैं।हवा में घुलकर धूल का रूप ले लेती है, जिससे श्वसन रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।वही बारिश के दौरान बहकर भूमिगत जल में मिल जाती है, जिससे पानी में जहरीले तत्व घुल जाते हैं।साथ ही जमीन की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचाकर भूमि को बंजर बना सकती है।बहरहाल आज गड्ढे पाटने के लिए किया गया यह अस्थायी उपाय आने वाले वर्षों में खतरा बढ़ा सकता है।

एन एच 49 में डंपिंग की खुली छूट

गौरतलब हो कि रायगढ़ से गुजरने वाला नेशनल हाईवे-49 लंबे समय से फ्लाईऐश डंपिंग का महफूज ठिकाना बना हुआ है। हाईवे के दोनों ओर जगह-जगह फ्लाईऐश के ऊंचे ढेर साफ देखे जा सकते हैं। प्रस्तुत तस्वीरें इस बात की गवाही देती हैं कि खुले में, बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के फ्लाईऐश का भंडारण किया जा रहा है, जो न केवल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के स्पष्ट निर्देशों का उल्लंघन है, बल्कि आमजन की सेहत और पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है।एक और जहां नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा फ्लाईऐश प्रबंधन को लेकर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। एनजीटी के अनुसार स्पष्ट किया है कि फ्लाईऐश का उपयोग केवल नियंत्रित और तकनीकी प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है। इसमे
लेयरिंग और कवरिंग अनिवार्य है।ऊपर से मिट्टी या अन्य सुरक्षित सामग्री का भराव भी जरूरी है।आबादी, सड़क और जल स्रोतों के पास खुले उपयोग पर रोक है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हाईवे किनारे और मुख्य मार्ग पर ही फ्लाईऐश डाल दी जा रही है, जिससे नियमों की खुली अवहेलना हो रही है।

सड़क और आमजन की सुरक्षा पर असर

गड्ढों की भराई के नाम पर सड़क किनारे डाली गई फ्लाईऐश न केवल पर्यावरण बल्कि यातायात सुरक्षा के लिए भी खतरा है। सूखी फ्लाईऐश उड़कर सड़क पर धुंध जैसी स्थिति पैदा करती है, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है। वहीं भारी वाहनों के गुजरने से यह सामग्री सड़क पर फैलकर फिसलन का कारण बनती है।यह कहना गलत नहीं होगा कि फ्लाईऐश आज इसके उपयोगकर्ता के लिए तात्कालिक राहत का साधन बन गया है, लेकिन इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ सकते हैं। यदि अभी भी इसके उपयोग को नियंत्रित नहीं किया गया, तो स्वास्थ्य, पर्यावरण और जल संसाधनों पर इसका दुष्प्रभाव देखने को मिल सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार फ्लाईऐश में सिलिका, एल्युमिनियम, आयरन और मरकरी जैसे खतरनाक तत्व पाए जाते हैं। हवा के संपर्क में आते ही यह महीन कण उड़कर दमा, अस्थमा और सांस संबंधी बीमारियों को बढ़ावा देते हैं।आंखों में जलन, त्वचा रोग और एलर्जी का कारण बनते हैं।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि उद्योग विभाग और संबंधित प्रशासनिक अमला कार्यवाही के नाम पर हाथ पर हाथ धरे बैठा नजर आ रहा है। फ्लाईऐश परिवहनकर्ताओं को मानो खुली छूट मिली हुई है। न जुर्माना, न जब्ती, न ही किसी प्रकार की सख्त कार्यवाही एनजीटी के आदेशों की खुली अवहेलना को दर्शाती है।

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