प्राची विहार में 165 अटल आवासों को बनाकर भूला नगर निगम प्रशासन, बदहाली में कट रही रहवासियों की जिंदगी
छत से टपकता पानी, दीवारों से उखड़ रहा प्लास्टर, गिरते दीवारो से लोगों की जानमाल पर खतरा
स्वच्छ भारत और सुघ्घर रायगढ़ की परिकल्पना खोखला, सामुदायिक शौचालय बंद होने से महिलाओं को जाना पड़ता है खेत-खलिहान
रायगढ़। शहर के विभिन्न क्षेत्रों सेविस्थापित किए गए परिवारों को आशियाना देने वाला नगर निगम प्रशासन अब उन्हीं परिवारों की सुध लेना भूल गया है। प्राची विहार कालोनी में बनाए गए 165 अटल आवास बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं। कई ब्लाकों में बने क्वार्टरों की छतें जर्जर हो चुकी हैं। कहीं पानी टपक रहा है तो कहीं प्लास्टर उखड़कर तथा दीवार गिर रहा है। हालात इतने खराब हैं कि बारिश का पानी घरों में आने से रोकने और प्लास्टर के मलबे से बचने के लिए कवच की तरह रहवासियों ने छत पर प्लास्टिक की तिरपाल बांधे है। नगर निगम के अपने ही बनाए आवासों की यह स्थिति उसके रखरखाव और जिम्मेदारी के दावों की पोल खोल रही है। जिससे यहां के लोग नरकीय जीवन जीने को मजबूर है ।
गौरवपथ सड़क चौड़ीकरण सहित शहर के अलग-अलग हिस्सों में अतिक्रमण हटाने के दौरान प्रभावित और विस्थापित परिवारों को इन आवासों में बसाया गया था। उद्देश्य था कि उन्हें स्थायी छत देकर सुरक्षित जीवन उपलब्ध कराया जा सके, लेकिन वर्षों बाद इन परिवारों के सामने फिर से सुरक्षित आशियाने का संकट खड़ा हो गया है। नीचे और ऊपर दोनों मंजिलों के क्वार्टरों में छत से पानी रिसने और दीवारों का प्लास्टर टूटकर गिरने की समस्या है। भवनों की मरम्मत नहीं होने से रहवासी खुद जुगाड़ के सहारे अपने घरों को रहने लायक बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। लोगों को छत दीवार तथा प्लास्टर टूट कर गिरने का डर 24 घंटे उन्हें सताता है कुछ लोगों ने बरसात के बाद भी तिरपाल को बांधकर रखें है। उनका मानना है कि प्लास्टर और छत का मलबा गिरे तो काफी हद तक यह प्लास्टिक जानमाल में कवच की तरह है। इसके अलावा तत्कालीन दौर में क्वाटर बनाकर बसाया तो गया है लेकिन वहां शौचालय नहीं है। आवास परिसर में शौचालय की सुविधा का अभाव रहवासियों की परेशानी बढ़ा रहा है।
वर्तमान परिदृश्य में कुछ लोगों ने अपने अपने घरों में प्रधानमंत्री स्वच्छ भारत अभियान के तहत निजी शौचालय बनाया हैं । इस तरह टपकते छत, टूटते मकान का छज्जा के बीच जीवन को खतरे में डालकर यहां रहने वाले 165 परिवार के लोग बदहाली की मार झेल रहे हैं । बुनियादी सुविधाओं का आभाव और नगर निगम प्रशासन की उदासीनता से लोगों में काफी नाराजगी है। वहीं सरकार से भी वे बेहतर जिन्दगी की मांग कर रहे हैं ताकि उनका और उनके बच्चों का जीवन सामाजिक सामरिक परिस्थितियों में आ सके।
सामुदायिक शौचालय बंद, कचरा संग्रहण नहीं, जगह जगह ढ़ेर
प्राची विहार कालोनी में रहने वाले कई घरों में शौचालय नहीं होने के चलते निगम प्रशासन ने परिसर में एक सामुदायिक शौचालय निर्माण कराया था। यह शौचालय अभी घटिया स्तर से निर्माण होने के चलते अवस्था में आ गया इसके बाद इसे पुनः मरम्मत के लिए रखा गया , वहीं अब मरम्मत के नाम पर बंद पड़ा है। सफाई व्यवस्था को लेकर भी स्थानीय लोग परेशान हैं। उनके मुताबिक, नगर निगम के कर्मचारी सप्ताह में केवल एक दिन कचरा उठाने पहुंचते हैं। डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण की व्यवस्था भी नियमित राहत नहीं दे पा रही है। 165 क्वार्टरों में रहने वाले परिवार लंबे समय से इन समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन समाधान के लिए कोई ठोस पहल दिखाई नहीं देती।
निगम अपनी संपत्ति और जनता जनार्दन के संरक्षण से भी मुंह फेरा
विस्थापित परिवारों को आवास उपलब्ध कराना ही प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि उन्हें सुरक्षित और रहने योग्य बनाए रखना भी नगर निगम का दायित्व है। इसके बावजूद भवनों की मरम्मत, बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और नियमित सफाई को लेकर उदासीनता बनी हुई है। एक ओर स्वच्छ रायगढ़-सुधार रायगढ़ की परिकल्पना को लेकर दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर निगम के अपने आवास परिसर में लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। सवाल यह है कि नगर निगम अपने ही बनाए 165 आवासों की सुध कब लेगा।
शहर में खोज रहे हैं लोगों के जर्जर मकान, अपने बनाए आवास में हादसा हुआ तो जिम्मेदार कौन..?
अटल आवासों की जर्जर हालत रहवासियों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। कुछ लोगों ने चर्चा के दौरान बताया कि छत का प्लास्टर कभी भी अचानक टूट कर निकलता है जिससे खतरा बना हुआ रहता है।
निवासरत लोग दीवारों की स्थिति को देखते हुए भवनों की मजबूती पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में यदि किसी भवन का हिस्सा गिरने से दुर्घटना होती है या कोई रहवासी इसकी चपेट में आता है तो जवाबदेही किसकी होगी। क्या नगर निगम किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है। जरूरी है कि सभी भवनों की तकनीकी जांच कराकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। ऐसे में भवनों की मरम्मत से निगम को परहेज नजर आ रहा है।
महिलाएं खेत-खलिहानों का रुख करने मजबूर महिलाएं
घरों में शौचालय नहीं और परिसर का सामुदायिक शौचालय मरम्मत के नाम पर बंद है। ऐसे में महिलाओं को शौच के लिए खेत-खलिहानों का रुख करना पड़ता है। यह केवल सुविधा का अभाव नहीं, बल्कि उनकी निजता, गरिमा और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। स्वच्छ भारत अभियान के दावों के बीच नगर निगम के अपने आवास परिसर में महिलाओं की यह स्थिति प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। और नगर निगम प्रशासन की गैर जिम्मेदार रवैये से लोगों में काफी नाराजगी हैं।
क्या कहते है प्राची विहार रहवासी
पानी और टूटते प्लास्टर के मलबे बचने तिरपाल का सहारा –
शेष कुमार टंडन क्वाटर नंबर 44 वर्ष ने बताया कि 12 साल से निवासी : इतने वर्षों से यहां रह रहे हैं, लेकिन आवासों की हालत सुधरने के बजाय और खराब होती जा रही है। छत से पानी टपकता है और प्लास्टर टूटकर गिरता है। बारिश में घर को पानी से बचाने के लिए छत पर प्लास्टिक की तिरपाल बांधनी पड़ती है। आखिर नगर निगम ने हमें आवास देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली है क्या? हमारी मांग है कि भवनों की तत्काल मरम्मत कराई जाए। बार-बार परेशानी झेलने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
मकान तो जर्जर है महिलाओं की समस्या गंभीर –
चमेली टंडन क्वार्टर नंबर 48 ने बताया कि महिलाओं की परेशानी समझने वाला यहां कोई नहीं है। यहां रहने वाले कई घर में शौचालय नहीं है और सामुदायिक शौचालय भी मरम्मत के नाम पर बंद कर दिया गया है। मजबूरी में महिलाओं को खेत-खलिहानों की ओर जाना पड़ता है। यह बेहद शर्मनाक स्थिति है। नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों से कई बार गुहार लगाने के बाद भी समस्या जस की तस है। कम से कम महिलाओं की परेशानी को देखते हुए सामुदायिक शौचालय को तत्काल शुरू कराया जाना चाहिए।
आवास तो मिला लेकिन सुविधाएं नगण्य –
बृज भूषण कुमार पांडेय क्वाटर नंबर 42 ने बताया कि वर्ष 2014 से निवास कर रहे हैं । आवास परिसर में रहने वाले परिवारों को मकान तो मिल गए, लेकिन सुविधाएं आज तक नहीं मिल पाईं। सफाई की स्थिति भी ठीक नहीं है। सप्ताह में केवल एक दिन कचरा उठाने कर्मचारी आते हैं, जिससे नियमित सफाई नहीं हो पाती। नगर निगम को यह समझना चाहिए कि यहां भी लोग रहते हैं और उन्हें भी साफ-सुथरा वातावरण मिलना चाहिए। आखिर निगम अपनी ही कॉलोनी की सुध क्यों नहीं ले रहा है? अधिकारियों को मौके पर आकर समस्याएं देखनी चाहिए।
निगम प्रशासन ने परेशानी से मुंह मोड़ा –
अजय चौहान, क्वार्टर नंबर 134, वर्ष 2019 से निवासरत है। वे पहले मिट्ठूमुड़ा में रहते थे। वहां से विस्थापन के दौरान यहां लाकर बसाया गया था। उम्मीद थी कि नए आवास में बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन यहां भी समस्याओं से छुटकारा नहीं मिला। भवनों की हालत खराब है और बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। विस्थापन के बाद हमें यहां बसाने वाला नगर निगम अब हमारी परेशानियों से मुंह मोड़े बैठा है। आखिर हम अपनी समस्याएं लेकर जाएं तो कहां जाएं? निगम प्रशासन को हमारी सुध लेकर मरम्मत और जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था करनी चाहिए।
वर्जन
मेरे द्वारा प्राचीन बिहार अटल आवास की समस्याओं को लेकर हमेशा से मुखरता के साथ नगर निगम और जिम्मेदार अधिकारियों के समक्ष को रखा गया है। पिछले सदन की कार्रवाई में भी प्राचीन बिहार में आवास की जर्जरता को लेकर सवाल उठाया गया था, जिसमें प्रशासन की ओर से जानकारी दी गई की टेंडर निकाला गया लेकिन आज तक उसे टेंडर का कार्यादेश ठेकेदार को नहीं दिया गया है। इससे यह तो स्पष्ट है कि नगर निगम प्रशासन प्राचीन बिहार के सुध लेने को दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। अगर भविष्य में यहां कोई हादसा होता है तो इसकी जिम्मेदारी निगम प्रशासन की होगी।
आशीष ताम्रकार, वार्ड पार्षद




