मंच पर सुंदरकांड का पाठ.., नीचे खड़े ओपी चौधरी बांटते रहे धार्मिक ग्रंथ रामचरित मानस – तीर्थयात्रियों का सम्मान बना सनातन परम्परा का जीवंत उदाहरण
सेवा संकल्प अभियान के तहत अयोध्या धाम और मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना के 1000 यात्रियों का सम्मान, वित्त मंत्री बोले – कानों में भजन और हाथों में ग्रंथ, यह अनमोल पल लौटकर नहीं आएगा
रायगढ़ :- सेवा संकल्प अभियान के तहत आयोजित श्री रामलला दर्शन (अयोध्या धाम योजना) एवं मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना के वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान समारोह में एक ऐसा भावुक कर देने वाला दृश्य देखने को मिला, जिसने हर किसी की आँखें नम कर दीं और सनातन परम्परा की सबसे बड़ी परम्परा को जीवंत कर दिया।
मंच पर सामूहिक सुंदरकांड और सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ गूंज रहा था। ढोल-मंजीरे की थाप पर जय श्री राम की धुन कानों में पड़ रही थी और नीचे मंच के सामने वित्त मंत्री श्री ओपी चौधरी खड़े होकर अपने हाथों से एक-एक वरिष्ठ नागरिक को धार्मिक ग्रंथ रामचरित मानस वितरित कर रहे थे। मंच पर भजन, नीचे हाथों में रामायण – यह संगम आध्यात्मिक अनुभूति का एहसास करा रहा था।
सांसद राधेश्याम राठिया राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह, महापौर जीवर्धन चौहान, सभापति डिग्रीलाल चौहान, जिला पंचायत अध्यक्ष शिखा रविंद्र गबेल भाजपा नेता सुभाष पांडे सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। लेकिन सबकी निगाहें उस पल पर टिकी थीं, जब ओपी चौधरी बुजुर्गों के चरणों में शीश नवाते हुए उन्हें रामचरित मानस भेंट कर रहे थे। बुजुर्गों के चेहरे पर सम्मान का भाव और आँखों में खुशी के आँसू थे। इस अवसर पर वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने भावुक होते हुए कहा – कानों में सुंदरकांड का भजन और हाथों से आप सभी को धार्मिक ग्रंथ रामचरित मानस का वितरण, यह आध्यात्मिक अनुभूति का एहसास करा रहा है। सभी तीर्थ यात्रियों के चरणों में शीश नवाता हूँ। यह पल जीवन का अनमोल पल है। हनुमान जी की अनुपम भक्ति और धार्मिक ग्रंथ रामचरित मानस के वितरण का ऐसा अद्भुत पल जीवन में लौटकर नहीं आएगा। उन्होंने कहा कि प्रभु राम के अयोध्या दर्शन कराने का पावन अवसर विष्णुदेव साय सरकार को मिला, यह हमारे लिए आत्मिक संतोष का पल है। दीपावली के दिन हम सब घर के बाहर दिए जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं, यह दिन भगवान राम के लंका विजय के बाद अयोध्या वापसी का दिन भी है। मेरी कामना है कि सभी के जीवन में खुशियों का दीप सदा जलता रहे। उन्होंने जानकारी देते हुए कहा गत वर्ष इस योजना के तहत जिले भर से 1000 लोग दर्शन कर चुके थे । इस वर्ष भी जिले भर से 1000 लोग प्रभु राम के दर्शन कर चुके है। रमन सरकार की इस योजना को भूपेश सरकार ने आते ही बंद कर दिया और प्रदेश के हजारों वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना के लाभ से वंचित हो गए थे। साय सरकार ने आते ही बतौर वित्त मंत्री इस योजना हेतु बजट का प्रावधान किया गया। सरकार यह कार्य लगातार कराती रहेगी। तीर्थयात्रियों को रामचरित मानस देना सम्मान के साथ, सनातन में महादान की परम्परा का निर्वहन भी है। रायगढ़ में यह आयोजन सनातन संस्कृति के उसी पुरातन विधान का निर्वाह है, जिसे हमारे शास्त्रों में धर्म-ग्रंथ दानं महादानं गया है। शास्त्रों में कहा गया है तीर्थयात्रा फलं ज्ञानं। यानि तीर्थयात्रा का फल केवल दर्शन नहीं, ज्ञान है। इसलिए जब यात्री तीर्थ से लौटता है तो उसे धर्म ग्रंथ देकर भक्ति भाव को चीर स्थाई बनाया जाता है, ताकि वह तीर्थ की अनुभूति को जीवन भर अपने घर में जीवित रख सके। रामचरित मानस सिर्फ ग्रंथ नहीं बल्कि चलता-फिरती अयोध्या है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने उत्तरकांड में लिखा है यह सुभ पुस्तक जो पढ़हिं, हरहिं काम मद मोह। महाभारत काल के वन पर्व में उल्लेख है कि पांडव जब तीर्थयात्रा से लौटे तो महर्षि वेदव्यास और लोमश ऋषि ने उन्हें पुराणों और धर्मग्रंथों की प्रतिलिपि भेंट की थी, ताकि राजा उस ज्ञान से प्रजा का पालन करे।
गुप्त काल को स्वर्ण काल इसलिए कहा जाता है क्योंकि तब राजा तीर्थयात्रियों को सोना नहीं, ताम्रपत्र पर लिखे धर्मग्रंथ दान करते थे। आदि शंकराचार्य ने चार धामों की स्थापना के बाद नियम बनाया था कि हर धाम से लौटने वाले यात्री को वेद-मंत्र की एक पांडुलिपि दी जाए। ओपी ने कहा इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने जब काशी विश्वनाथ से लेकर अयोध्या, सोमनाथ तक सैकड़ों मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, तो उन्होंने हर तीर्थयात्री जत्थे को अपने हाथ से रामायण और शिवमहापुराण की हाथ से लिखी प्रति भेंट की थी। उनका मानना था मंदिर बनाना पुण्य है, लेकिन यात्री के हाथ में ग्रंथ देकर उसे मंदिर जैसा बनाना महापुण्य है। छत्तीसगढ़ की अपनी ग्राम-रामायण परम्परा का जिक्र करते हुए ओपी ने कहा हमारे छत्तीसगढ़ में तो यह परम्परा घर-घर में है। जब कोई बुजुर्ग राजिम कुंभ या पुरी यात्रा से लौटता था, तो गांव के मुखिया द्वारा उसे रामायण भेंट की जाती थी और उसे “रामायण बांचने” के लिए कहा जाता था। आज भी गांवों में वृद्धजनों को रामचरित मानस देकर सम्मानित करने को “राम-समाधि” सम्मान कहा जाता है। इसलिए रायगढ़ में जो दृश्य बना – मंच पर सुंदरकांड और नीचे हाथों में रामचरित मानस – यह कोई आयोजन नहीं, बल्कि अहिल्याबाई होलकर, गुप्त सम्राटों और वेदव्यास की परम्परा को फिर से जीवित करने का शाश्वत प्रयास है। ग्रंथ देना उसे जीवन भर के लिए ऋषि बना देना है।




