शारदीय नवरात्रि पर मौन साधना के पश्चात पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी का आशीर्वचन
बाबा ने कहा 84 लाख योनियों में मनुष्य जीवन ही कर्म योनि है, इसी से होता है मोक्ष का मार्ग प्रशस्त
पूज्य पाद ने बताया शक्ति के बिना आँख खोलना भी संभव नहीं, असुरों ने किया दुरुपयोग, देवताओं ने की आराधना
निष्काम उपासना ही जीवन का सर्वोत्तम मार्ग, भगवती की आराधना से खुलती है जड़-चेतन की ग्रंथि – बाबा प्रियदर्शी राम
समस्त स्त्रियां भगवती का स्वरूप नारी सम्मान के बिना अधूरी है देवी उपासना – पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी
शारदीय नवरात्रि पर मौन साधना के पश्चात पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी का आशीर्वचन
बाबा ने कहा 84 लाख योनियों में मनुष्य जीवन ही कर्म योनि है, इसी से होता है मोक्ष का मार्ग प्रशस्त
पूज्य पाद ने बताया शक्ति के बिना आँख खोलना भी संभव नहीं, असुरों ने किया दुरुपयोग, देवताओं ने की आराधना
निष्काम उपासना ही जीवन का सर्वोत्तम मार्ग, भगवती की आराधना से खुलती है जड़-चेतन की ग्रंथि – बाबा प्रियदर्शी राम
अंबिकापुर :-शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाली शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी ने भगवती आराधना के गूढ़ रहस्यों पर विस्तृत आशीर्वचन दिया। उन्होंने कहा कि हम सभी सौभाग्यशाली हैं जो एकांत स्थान में बैठकर उस जगत जननी की आराधना में लगे हैं, जिसका स्मरण मात्र करने से वह सभी प्राणियों का भय हर लेती है। जो स्वस्थ मन से उनकी उपासना करता है, उसे वे परम कल्याणकारी बुद्धि प्रदान करती हैं और भक्तों के पाप, दुख का नाश करती हैं।
बाबा जी ने कहा कि यह आराधना केवल मनुष्यों ने ही नहीं, बल्कि देवताओं ने भी की थी। जब असुरों ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर वर माँगा कि मानव, दानव और देव कोई उन्हें न मार सके, तो उन्होंने स्त्री जाति को छोड़ दिया। वर पाकर असुरों ने सत्यलोक, तपलोक, जनलोक, महालोक, स्वर्गलोक, भूलोक सहित सभी लोकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। तब संकट में पड़े सभी देवताओं ने एक स्वर में उस भगवती का स्मरण किया, जिसे दुर्गा, काली, चंडी, तारा, महामाया और जगदंबिका जैसे नामों से पूजा जाता है। पर वह एक ही शक्ति है जो सबका कल्याण करती है।
देवताओं की प्रार्थना सुनकर माता ने रौद्र रूप धारण किया और मधु-कैटभ, महिषासुर, रक्तबीज, शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड, धूम्राक्ष जैसे असुरों का संहार कर देवताओं को पुनः स्थापित किया ताकि सृष्टि की सामाजिक व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके और अराजकता न फैले। कार्य सिद्ध होने पर देवताओं ने जिस स्तुति से भगवती को प्रसन्न किया, वह दुर्गा सप्तशती के एकादश अध्याय में वर्णित है। यह ग्रंथ सात सौ श्लोकों से निर्मित हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें जीवन के हर मनोरथ की सिद्धि का मार्ग है।
बाबा जी ने सकाम और निष्काम उपासना के भेद को स्पष्ट करते हुए सुमेधा ऋषि, राजा सुरथ और वैश्य समाधि की कथा सुनाई। राजा सुरथ शत्रुओं से अपना राज्य हार चुके थे और समाधि वैश्य को उसके ही पुत्रों ने धन के लिए प्रताड़ित किया था। दोनों भगवती की शरण में पहुँचे। सुमेधा ऋषि के उपदेश पर राजा सुरथ ने सकाम उपासना कर अपना राज्य वापस पा लिया, जबकि समाधि ने निष्काम भाव से तपस्या कर मोक्ष प्राप्त किया। एक ही स्थान पर सैकड़ों लोग उपासना करते हैं, सबके भाव, लक्ष्य और उद्देश्य अलग होते हैं और भगवती सबकी पूर्ति करती हैं। फिर भी निष्काम उपासना को सर्वोत्तम बताया गया है।
पीठाधीश्वर ने कहा कि हम प्रतिदिन जो मंत्र दोहराते हैं, उसका मर्म समझना आवश्यक है। एक श्लोक के जरिए उन्होंने बताया कि माता, हमें हमारे स्वरूप का दर्शन करा दो, हमारे भीतर स्थित आत्मा का ज्ञान करा दो जो अज्ञान के आवरण से ढका है। जयं देहि का अर्थ किसी बाहरी शत्रु पर जय नहीं, बल्कि हमारे भीतर के मोह पर विजय है। धृतराष्ट्र पुत्र-मोह में वशीभूत होकर सत्य से विचलित हो गए, भगवान के पाँच गाँव माँगने पर भी मौन रहे। वहीं राजा हरिश्चंद्र ने काशी के श्मशान में डोम का सेवक बनकर सत्य के लिए अपने ही पुत्र के कफन का आधा हिस्सा माँग लिया। यही मोह पर विजय है। यशो देहि वह यश है जो आत्मज्ञान और मोह पर विजय के बाद मिलता है, जब मनुष्य अपना-पराया से ऊपर उठकर परमार्थ के लिए जीता है और संत, साधक, सज्जन बन जाता है। बाबा जी ने शक्ति की महिमा पर उपनिषद का दृष्टांत दिया। एक बार असुरों पर विजय के बाद देवता अभिमान में थे। तभी एक दिव्य यक्ष प्रकट हुआ। इंद्र के कहने पर अग्निदेव गए और कहा मैं सब कुछ जला सकता हूँ, यक्ष ने एक तिनका फेंककर जलाने को कहा तो वे न जला सके। वायुदेव ने कहा मैं सब कुछ उड़ा सकता हूँ, वे भी तिनके को न हिला सके। तब इंद्र के जाने पर यक्ष अंतर्ध्यान हो गया और वहाँ उमा देवी प्रकट हुईं। उन्होंने बताया वे ब्रह्म थे और मेरी ही शक्ति से तुम शक्तिमान हो। यह शक्ति चींटी से हाथी तक, मनुष्य से देवता तक सबको चाहिए। बिना शक्ति के आँख खोलना भी संभव नहीं। असुरों ने शक्ति का दुरुपयोग कर अधिपत्य जमाया, इसलिए हम प्रार्थना करते हैं कि शक्ति का दुरुपयोग न हो। बाबा प्रियदर्शी राम जी ने कहा सिद्ध कुंजिका को ताले की चाबी बताया। जैसे बड़ा घर, बड़ी कुंडी और बड़े ताले को छोटी सी कुंजी खोल देती है, वैसे ही यह पाँच मिनट का पाठ दुर्गा सप्तशती के रहस्यों को खोल देता है। कवच और कीलक का अर्थ है सुरक्षा घेरा, कि बिना हमारी अनुमति के कोई तांत्रिक क्रिया, मारण, मोहन, वशीकरण, स्तंभन, उच्चाटन आदि हम पर प्रभाव न कर सके। यह किसी पर प्रयोग के लिए नहीं, बल्कि अपनी रक्षा के लिए है।
भगवती कहती हैं रोगान् शेषान् अपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलान् अभीष्टान्। प्रसन्न होने पर वह सभी रोगों को हर लेती हैं और यहाँ रोग का अर्थ सर्दी-खाँसी नहीं, बल्कि महारोग अज्ञान है। और कुपित होने पर भी वह करुणा की मूर्ति हैं, वह हमारे अंदर की कामना, वासना, तृष्णा का नाश कर देती हैं, जो दुर्योधन की तरह अहंकार और अभिमान पैदा करती है। इसी अहंकार के कारण युद्ध टला नहीं। इसलिए संत मिलन को जाइए, तज ममता अभिमान।
बाबा जी ने नारी सम्मान को देवी उपासना का आधार बताया। श्लोक के जरिए उद्धृत करते हुए कहा विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:, स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु। संसार की समस्त विद्याएं और समस्त स्त्रियां उसी भगवती का स्वरूप हैं। इसलिए सच्चे उपासक को सभी माताओं में मातृभाव, छोटी बच्चियों में बहन का भाव और पत्नी के अलावा अन्य सभी में माता-बहन का भाव रखना चाहिए। पत्नी मनोरमां देही की प्रार्थना में भी एक ऐसी पत्नी की कामना है जो इस दुर्गम भवसागर से पार उतारने में मदद करे। तुलसीदास जी को भी उनकी पत्नी ने ही अस्थि-चर्म के मोह से निकालकर राम-भक्ति के मार्ग पर लगाया। मंदोदरी और तारा ने भी अपने पतियों को समझाया। पूज्य पाद बाबा जी ने कहा कि मनुष्य जीवन 84 लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि अन्य सभी योनियाँ भोग योनि हैं, जहाँ पुण्य-पाप का क्षय होता है, पर यह कर्म योनि है। हमें अच्छा कुल, परिवार और स्वस्थ शरीर मिला है तो यह ईश्वर की कृपा है। इसके प्रति कृतज्ञता ही आराधना, भजन और सेवा है। नवरात्रि में किया गया जप ग्रहण काल के समान हजार गुना फल देता है। चार नवरात्रि में से दो गुप्त और दो प्रकट आश्विन और चैत्र में मनाए जाते हैं। साधक को अपनी दिनचर्या ठीक रखनी चाहिए, सूर्योदय से आधा घंटा पहले उठकर पृथ्वी माँ को प्रणाम करना चाहिए, शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान इन षट् संपत्तियों का अभ्यास करना चाहिए ताकि इंद्रियाँ और मन भटके नहीं। हमारे दुख का कारण जड़-चेतन की ग्रंथि है।आत्मा होते हुए भी शरीर को समझना ही अज्ञानता हैं। भगवती की आराधना के हथौड़े से ही यह ग्रंथि टूटती है और बुद्धि जो आत्मा के सबसे समीप है, वह आत्मा के संकेतों को समझने लगती है। इसीलिए हम प्रार्थना करते हैं देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। उन्होंने सभी भक्तों से आह्वान किया कि मंत्रों को केवल वाणी से नहीं, हृदय में उतारकर उसके गूढ़ रहस्यों को समझें और जीवन में सत्य के पथ पर चलें, क्योंकि सत्य ही ईश्वर का दूसरा नाम है।




