निगम अपनी संपत्ति संभालने नाकाम, 197 दुकानें बनाईं, 90 से किराया नहीं; निर्माण के बाद उपयोग और राजस्व दोनों पर सवाल
जेल कॉम्प्लेक्स की मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना और निगम मद की दुकानों का मामला, 188 दुकानों का आवंटन लेकिन बड़ी संख्या में किराया बकाया; अब पुरानी दुकानों को जर्जर बताकर नए निर्माण की तैयारी
रायगढ़/ नगर निगम में सरकारी धन से निर्माण कार्य कराने और उसके बाद निर्मित संपत्तियों का समुचित उपयोग सुनिश्चित करने के बीच कितना बड़ा अंतर है, इसकी तस्वीर जेल परिसर रोड स्थित व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स में देखने को मिल रही है। शहर में रोजगार और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना तथा नगर निगम मद से बड़ी संख्या में दुकानों का निर्माण कराया गया। उद्देश्य था कि जरूरतमंद लोगों को व्यवसाय के लिए जगह मिले और निगम को नियमित राजस्व प्राप्त हो। लेकिन निर्माण के बाद दुकानों के आवंटन, प्रीमियम जमा कराने और नियमित किराया वसूली की स्थिति ऐसी रही कि निगम अपनी ही संपत्ति से अपेक्षित लाभ नहीं ले सका।
विभागीय आंकड़ों के मुताबिक यहां कुल 197 दुकानों का निर्माण कराया गया, जिनमें 188 दुकानों का आवंटन किया गया है। इसके बावजूद 90 दुकानों से किराया जमा नहीं होने का उल्लेख है। अब लगातार उपेक्षा के बीच इन दुकानों को जर्जर घोषित कर उसी परिसर में नए सिरे से दुकान निर्माण की तैयारी की जा रही है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब पहले से निर्मित दुकानों का ही बेहतर उपयोग और रखरखाव नहीं हो सका तो नए निर्माण से निगम को राजस्व मिलने की गारंटी कौन सुनिश्चित करेगा?जेल परिसर रोड पर मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना के तहत भूतल में 67 और प्रथम तल में 66 दुकानें निर्मित की गई हैं। इस तरह कुल 133 दुकानें तैयार की गईं। प्रत्येक दुकान का आकार 10 गुणा 8 दर्ज है। इनमें भूतल की 66 और प्रथम तल की 62 दुकानों का आवंटन किया गया। यानी कुल 128 दुकानों का आवंटन हुआ।विभागीय जानकारी के अनुसार भूतल की 26 और प्रथम तल की महज 4 दुकानों से किराया जमा किया जा रहा है। इसके विपरीत भूतल की 39 और प्रथम तल की 23 दुकानों को किराया जमा नहीं करने वाली श्रेणी में रखा गया है। इस तरह कुल 62 दुकानों से किराया प्राप्त नहीं होने का उल्लेख है। प्रथम तल की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, जहां आवंटित 62 दुकानों में से महज 4 दुकानों से किराया जमा होने की जानकारी दी गई है।वहीं इस सूची में आवंटित दुकानों और किराया जमा करने तथा नहीं करने वाली दुकानों की संख्या के बीच भी अंतर दिखाई देता है। भूतल में 66 आवंटित दुकानों के मुकाबले 26 किराया देने वाली और 39 किराया नहीं देने वाली दुकानें दर्ज हैं। प्रथम तल में 62 आवंटित दुकानों के मुकाबले 4 किराया देने वाली और 23 किराया नहीं देने वाली दुकानें हैं। इस तरह कुल 36 दुकानों की स्थिति इन श्रेणियों में स्पष्ट नहीं होती। निगम को यह बताना होगा कि इन दुकानों की वर्तमान स्थिति क्या है और इनसे किराया क्यों नहीं मिल रहा है।
निगम मद से 64 दुकानें बनीं, 28 से नहीं मिल रहा किराया
मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना के अलावा नगर निगम मद से भी इसी परिसर में दुकानों का निर्माण कराया गया। इस श्रेणी में भूतल में 32 और प्रथम तल में 32 दुकानें बनाई गई हैं। यानी कुल 64 दुकानों का निर्माण हुआ। इनका आकार 14 गुणा 10 दर्ज है। इनमें भूतल की 31 और प्रथम तल की 29 दुकानों का आवंटन किया गया। इस तरह कुल 60 दुकानों का आवंटन हुआ।इन दुकानों से संबंधित विभागीय आंकड़ों के अनुसार भूतल की 26 और प्रथम तल की 6 दुकानों को प्रीमियम एवं किराया जमा करने वाली श्रेणी में रखा गया है। यानी कुल 32 दुकानों का भुगतान संबंधी उल्लेख है। वहीं भूतल की 5 और प्रथम तल की 23 दुकानों को किराया जमा नहीं करने वाली श्रेणी में रखा गया है। इस तरह निगम मद से निर्मित दुकानों में भी 28 दुकानों से किराया नहीं मिलने की स्थिति दर्ज है।इससे भी अहम बात यह है कि प्रथम तल की 23 दुकानों में से 10 दुकानों का प्रीमियम तक जमा नहीं होने का उल्लेख किया गया है।
पुरानी दुकानों की बदहाली के बाद अब नए निर्माण की तैयारी
जेल कॉम्प्लेक्स की दुकानों को लेकर अब निगम द्वारा इन्हें जर्जर घोषित कर जेल परिसर में मौजूद निगम की भूमि पर नए सिरे से दुकानों के निर्माण की बात कही जा रही है। इस प्रस्तावित निर्माण कार्य के लिए हाउसिंग बोर्ड को एजेंसी बनाए जाने की जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि वर्तमान में निर्माण से संबंधित ड्राइंग और डिजाइन भी हाउसिंग बोर्ड के पास है।लेकिन इस पूरी कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल पुरानी दुकानों की जवाबदेही का है। आखिर इन दुकानों से समय पर प्रीमियम और किराया क्यों नहीं वसूला गया? जिन आवंटियों ने लंबे समय से किराया जमा नहीं किया, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? क्या निगम ने कभी दुकानों का भौतिक सत्यापन कराया? क्या यह पता लगाने की कोशिश हुई कि आवंटित दुकानों का वास्तविक उपयोग हो रहा है या वे बंद पड़ी हैं? यदि दुकानों की स्थिति वर्षों से खराब थी तो उनके रखरखाव के लिए क्या कदम उठाए गए?
निर्माण में सक्रियता, रखरखाव और वसूली में उदासीनता
नगर निगम की जिम्मेदारी केवल सरकारी राशि खर्च कर भवन और दुकानें खड़ी करने तक सीमित नहीं है। निर्मित संपत्ति का रखरखाव, उसका व्यावसायिक उपयोग, आवंटन की पारदर्शिता और नियमित राजस्व वसूली भी उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। जेल कॉम्प्लेक्स के आंकड़े बताते हैं कि निर्माण के बाद इन बुनियादी जिम्मेदारियों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। एक ओर बड़ी संख्या में दुकानें किराया नहीं दे रही हैं, दूसरी ओर प्रीमियम जमा नहीं होने के मामले भी सामने हैं। अब पुरानी दुकानों को जर्जर बताकर नए निर्माण की तैयारी की जा रही है।ऐसे में नए निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले पुरानी दुकानों के आवंटन, प्रीमियम, किराया बकाया और वर्तमान उपयोग की स्थिति का पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। आखिर जनता के पैसे से बनी संपत्ति का लाभ न निगम को मिला और न ही उसका उद्देश्य पूरी तरह पूरा हुआ।
ईई ने झाड़ा पल्ला, राजस्व विभाग का मामला बताकर जिम्मेदारी से बनाई दूरी
जेल कॉम्प्लेक्स में निर्मित दुकानों के बकाया प्रीमियम और किराया वसूली को लेकर नगर निगम की कार्ययोजना क्या है, इस संबंध में जब निगम के कार्यपालन यंत्री (ईई) से सवाल किया गया तो उन्होंने इसे राजस्व विभाग का मामला बताते हुए जवाब देने से ही किनारा कर लिया। उनका कहना था कि दुकानों से संबंधित प्रीमियम और किराया वसूली का विषय राजस्व विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में इस संबंध में वे कोई जानकारी नहीं दे सकते। हालांकि, दुकानों के निर्माण से लेकर उनके संचालन और निगम को मिलने वाली राजस्व राशि से जुड़े मामले में विभागीय समन्वय की जरूरत भी सामने आती है। इसके बावजूद बकाया राशि की वसूली को लेकर निगम की ओर से क्या पहल की जा रही है, इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
वर्सन/ जेल कॉम्प्लेक्स की दुकानों से बकाया प्रीमियम और किराया वसूली की जिम्मेदारी राजस्व विभाग का है।निर्माण कार्य की जवाबदेही परियोजना वालों की है।इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दे सकता हु।
ए के लोहिया, ई ई नगर निगम




