Saturday, February 7, 2026
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रोशनलाल को याद करते हुए …!प्रखर मध्यान्ह में अस्त हो जाना एक सूर्य का …!

रोशनलाल को याद करते हुए …!
प्रखर मध्यान्ह में अस्त हो जाना एक सूर्य का …!

  • प्रो. अम्बिका वर्मा
    इस संसार में आगमन और गमन की तारीखें वक्त की स्लेट पर हमेशा अंकित रहती हैं। इस यथार्थ के साथ दुनिया ऐसे ही धडक़ती और खामोश होती रहती है। अपने शुरूआती दिनों में रोशन भाई ने बहुत संघर्ष भरा खुरदरा जीवन जिया था। वाणी का चिकनापन उन्हें नहीं भाता था। उनकी श्रध्दांजलि-सभा में अनेक प्रबुध्दजनों ने रोशन भाई के व्यक्तित्व के इसी तेवर की चर्चा की थी। लेकिन खरी सच्चाई यह भी रही कि उनके व्यक्तित्व के इस खुरदरेपन के सभी कायल थे। कैसा खरा व्यक्तित्व था तुम्हारा रोशन भाई। साफ बोलो और खुश रहो। साथ ही तुम्हारी जीवटता, सहयोग और 24 कैरेट वाली ईमानदारी के सभी मुग्ध प्रशंसक भी रहे। उधर… ऊपर नीले आसमान को भी तुम्हारी दरकार… तुम्हारी जरूरत आन पड़ी थी। न जाने कौन सा काम अटक रहा था तुम्हारे बिना, कि अचानक यूँ उसने रोशन भाई, आपको अपने पास बुला लिया। आदमी का बहुत अच्छा होना भी बहुत अच्छा नहीं होता। देवता को भी इतना अच्छा लगा कि उन्होंने रोशन भाई को असमय बुला ही लिया। शायर की कलम कह उठती है-
    ‘‘जो हमेशा, जिंदगी की खुशियों भरी मुस्कुराहट बाँटता रहा
    वो हमेशा के लिए जिंदगी भर हमें उदास कर गया !’’

रोशन भाई बचपन से ही निर्भीक, स्पष्टवादी और न्यायप्रिय थे। अपने, सामने अनुचित होते, अन्याय होते चुप नही रह पाते थे। देख कर अनदेखा नहीं कर पाते थे। दोस्तों के साथ खेल-खेल में जब किसी बात पर ठन जाती थी तो ये हमेशा सही का ही साथ देते थे चाहे सामने कोई भी हो, उम्र से बड़ा या बड़े घर का हो उनके लिए कोई मायने नहीं रखता था। अपने बाल मित्रों के साथ खेलते समय उनकी नजरें बड़ों व प्रतिष्ठित नागरिकों की ओर अनायास ही चली जाती और वे उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होते। उनके बचपन में बहुत दोस्त थे उसमें से प्रमुख रूप से शशिकांत शर्मा, सुरेश अग्रवाल, पुरूषोत्तम अग्रवाल, शिव अग्रवाल, रमेश अग्रवाल, यशवंत षडंग़ी, विजय अग्रवाल व बजरंगलाल अग्रवाल जिन्होंने उनके साथ बचपन में खेले कूदे व साथ पढ़े। बचपन में खेल के अलावा अपने बड़े भाईयों के साथ काम धंधे में मन लगाया करते थे। उन्हें जब भी समय मिलता घर के काम में हाथ बंटाना, जीवन के मूलतत्वों के विषय पर चर्चा किया करते थे। उनकी उत्सुकता, जिज्ञासा और लगन को देखकर, जीवन में जरूर कुछ बड़ा करेगा यह लोग मानने लगे थे।
नन्हे रोशनलाल को पढ़ाई लिखाई के अलावा नई चीजें सीखने में बहुत ललक थी, उन्होंने प्रायमरी की पढ़ाई भूपदेव पाठशाला से की। हाई व हायर सेकेण्डरी का अध्यापन नटवर हाई स्कूल में सम्पन्न हुआ। स्कूलिंग के बाद उन्होंने कामर्स कॉलेज से एम. कॉम. और विधि महाविद्यालय से लॉ की पढ़ाई भी पूरी की थी। बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखाओं में जाकर ध्वज प्रणाम, संघ खेल, बौध्दिक गतिविधियों के साथ-साथ संघ-संस्कार उनमें आने लगे थे। संघ की सामाजिक गतिविधियाँ ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। जनसरोकार के कार्य अपना मनपसंदीदा कार्य लगने लगा था। संघ के शिक्षावर्ग में जाकर संघ-शिक्षा भी ली और संघर्षमय जीवन से कुछ वक्त सामाजिक कार्यों में भी देने लगे। उनमें नेतृत्व क्षमता बचपन से ही थी इसलिए सामाजिक क्षेत्र में उनका मान सम्मान बढऩे लगा उनको लोग महत्व देने लगे। रोशन भाई का बाल्यकाल बहुत संघर्ष भरा रहा।
युवा रोशन भाई की सहज उपलब्धता और व्यक्तित्व के धाकड़पन से हर वर्ग के लोग रोशन भाई से जुड़े रहे। वे समय के पक्के, प्रबल इच्छाशक्ति तथा एडवांस प्लानिंग के बहुआयामी जननेता थे। कार्यकर्ता तैयार करने की कला खुद ईश्वर न उन्हें मुक्त हाथों से प्रदान की थी। रोशन भाई सहज उपलब्ध हो जाने वाले जनप्रतिनिधि बने रहे। उनसे मिलने के लिए समय लेने की आवश्यकता किसी भी आम या खास को नहीं पड़ी। बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति के दरवाजे तक वे स्वयं पहुंच जाते थे। वे ग्राम्य युवाओं के प्रेरक और संरक्षक थे। इस तेवर में वे किसी दल विशेष के नेता नहीं बल्कि रायगढ़ के सर्वहारा वर्ग के ऐसे स्थापित नेता रहे जिसकी स्वीकार्यता राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, और अन्य समस्त गैर राजनैतिक हल्कों में रही। रोशन भाई के अनुज बैजू भाई बताते हैं कि किसी परिवार या अन्य किसी ऐसे ही मामलों में उनकी मध्यस्थता एक सफल परिणाम तक अवश्यक पहुंचाती। दोनों पक्षों को संतुष्ट करने का हुनर रोशन भाई को आता था।
रायगढ़ जिले में राष्ट्रीय सेवा योजना के पर्याय और ब्रांड एम्बेस्डर बन चुके भोजराम पटेल कहते हैं कि राह चलते अपने सामान्य जनों को देखकर रूकना और हालचाल पूछना उन लोगों को मुग्ध और गर्वित कर जाता था। वे ग्राम्य युवाओं के प्रेरक और संरक्षक थे। ‘राजेन्द्र नन्दे के अनुसार वे समय के पक्के, प्रबल इच्छाशक्ति तथा एडवांस प्लानिंग के बहुआयामी जननेता थे। कार्यकर्ता तैयार की कला खुद ईश्वर ने उन्हें प्रदान की। रोशन भाई सहज उपलब्ध जनप्रतिनिधि बने रहे। उनसे मिलने के लिये किसी को कभी समय लेने की आवश्यकता किसी भी आम या खास को नहीं पड़ी, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति के दरवाजे त वे स्वयं पहुंच जाते। राजनीतिक परिदृश्य में स्व. लखीराम अग्रवाल एवं स्व. दिलीप सिंह जूदेव के सान्निध्य में रहते हुए उन्होंने पार्टी को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने में अहम भूमिका निबाही।
बहुत छोटी उम्र में श्रीकृष्ण ने केवल घुटनों के बल चलना ही नहीं सीखा थे बल्कि पूतना और ऐसी ही आसुरी शक्तियों का विध्वंस कर माता यशोदा को अपने मुख में पूरे ब्रहृमांड के दर्शन करा दिए थे। रोशन भाई श्रीकृष्ण होने जैसा कोई मुगालता पाले हुए शख्स नहीं थे, लेकिन उनके जैसा पैशन रोशन भाई में जरूर दिखाई देता रहा। हर जनसंघर्ष में अपनी सहभागिता और सदा अग्रिम पंक्तियों में वे खड़े रहते। दरअसल रोशन भाई के विचार और व्यक्तित्व में एक आग-एक सृजनधर्मी आग रही-जो सारी निगेटिविटी को जलाने के लिए हमेशा तत्पर रहती। साथ ही उनके भीतर एक बेहद संवेनदशील हृदय धडक़ता रहा जो उनके व्यक्तित्व को बहुत आत्मीय और मानवीय स्वरूप प्रदान करता था। सबसे खास बात यह भी कि पत्रकारिता के दुर्लभ गुण- निर्भीकता, तटस्थता, तथ्यपरकता और संवेदनशीलता समाहित रहे। अपने सम्पूर्ण राजनैतिक जीवन में रोशन भाई की अपनी चादर कबीर साहब की तरह साफ-शफ्फाक रही। यही बात रोशन भाई के इरादों, संकल्पों, कोशिशों और उनके अवदान को बहुत खूबसूरती से परिभाषित करती है भले ही वे संघर्षों के अंगारों पर चलते रहे लेकिन जख्म दर जख्म निखरते गए। हनुमान जी के प्रति उनकी प्रणम्य भक्ति और पाकेट हनुमान चालीसा भेंट करना उनकी अपनी चर्चित केसिरया आईडेन्टिटी थी।
रोशन भाई के अप्रत्याशित निधन पर जनमानस का यहं दर्द छलका कि रायगढ़ ने संघर्ष और जुझारू क्षमता के धनी एक लड़ाकू योध्दा को खो दिया। अब दर्द के घने बादलों के बीच रोशन भाई का हंसता मुस्कुराता चेहरा सिल्वर लाईन की तरह दमक जाता है। यह सही है कि देह रूप में वे हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके आदर्श उनका संघर्ष उनका वो जुझारूपन और ईमानदारी के गुण आज के युवा राजनीतिज्ञों की राहों को रोशन करते रहेंगे। वैसे भी पिता की कभी मृत्यु नहीं होती वे अपनी संतानों में सदा धडक़ते रहते हैं। वे अपने बेहद मिलनसार मृदुभाषी और डायनेमिक बेटे गौतम को अपना उजाला सौंपकर गए हैं। मन में यह विश्वास भी पलता है कि पिता की जनसेवा की यशस्वी परंपरा को वे निरंतर गति देते रहेंगे। जनमानस में भी यह विश्वास है कि रोशन थे, हैं और रहेंगे। वे अपनी आत्मा के उजालों से इस लोक को भी रोशन करते रहेंगे। हम सबकी स्मृतियों में रोशन भाई सदा बने रहेंगे।

सिटी कोतवाली के समक्ष, रायगढ़
मो. 8839362121
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