राह चलते हुये अक्सर ये गुमाँ होता है
वो नज़र छुप के मुझे देख रही हो जैसे
आज रोशन भाई की पुण्यतिथि है और उन्हें याद करते हुये सोशल मीडिया में कई लोगों ने अपने संस्मरण साझा किये हैं। मैं महसूस करता हूँ कि यह कोरी रस्म अदायगी नहीं है, क्योंकि आज के दिन ही नहीं वरन कई अन्य दिनों में भी वे अनायास ही हमारी चर्चाओं में दाखिल हो जाते हैं। बारहां ये बातें होती हैं कि यदि आज रोशन भाई होते तो ऐसा हुआ होता अथवा वैसा हुआ होता। उनकी यह अदृश्य उपस्थिति ही इस बात की परिचायक है कि बंदे में कुछ तो ऐसा था कि लोग जिसे आज भी मिस कर रहे हैं। सम्भवतः इसीलिये उनकी श्रद्धाजंलि सभा हेतु जब गिरधर भैया ने एक पंक्ति का शीर्षक देने को कहा तो मेरे मुँह से हटात ही निकला था – “तुझको तेरे बाद ज़माना ढूंढेगा” ।
राजनीतिक क्षेत्र में लंबे समय तक काम करते हुये हम कई लोगों के संपर्क में आते हैं। इनमें से कुछ लोगों की कार्यशैली हमारा राजनीतिक परिष्कार भी करती हैं। भारतीय जनता पार्टी में हमारी पीढ़ी का शायद ही कोई स्थानीय कार्यकर्ता होगा जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रोशन भाई के इस परिवर्तनकामी स्पर्श से अछूता रहा हो। अथक सक्रियता, मुद्दों की त्वरित पहचान, लक्ष्य को हासिल करने की जिद भरी दृढ़ता, लोगों की क्षमता पहचान कर उन्हें काम में लगा देना तथा छोटे से राजनीतिक घटनाक्रम को जरूरत के अनुरूप एक ही समय में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों दिशा में मोड़ देने की विलक्षण प्रतिभा रोशन भाई को अपने समकालीनों के बीच विशिष्ट बना देती थीं। रोशन भाई के सफरनामे में अक्सर उनके रोष व आक्रोश की आलोचनात्मक चर्चा भी होती है लेकिन इसके विपरीत मेरा निजी अनुभव यह रहा है कि रोष या गुस्से का जितना सटीक, सुविचारित व रचनात्मक उपयोग रोशन भाई कर पाते थे , वह अद्वितीय है।
लंबे समय तक साथ में कार्य करते समय तमाम तरह के खट्टे-मीठे अनुभवों का होना स्वाभाविक है लेकिन यह निर्विवादित सत्य है कि उनसे मैंने बहुत कुछ उपयोगी अवश्य सीखा है।
पुण्यतिथि पर ‘रोशन भाई’ का भावपूर्ण स्मरण करते हुये उन्हें सादर श्रद्धांजलि …
मुकेश जैन




