Thursday, January 15, 2026
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12 खदान पहले से संचालित, 18 और नए प्रस्तावित, 60 गांव हो जाएंगे रायगढ़ के नक्से से गायब

12 खदान पहले से संचालित, 18 और नए प्रस्तावित, 60 गांव हो जाएंगे रायगढ़ के नक्से से गायब

पर्यावरण और आमजन के जनजीवन, वन्य जीवों के जीवन पर पड़ेगा व्यापाक असर

रायगढ़। जिले में गौण खनिज की भरमार है। यही वजह है कि उद्योग जगत बीते 15 साल से सबसे अधिक स्थापित हो गया है, ऊर्जा आपूर्ति के लिए 12 कोयला खदान संचालित हो रहे है जबकि धरमजयगढ़ क्षेत्र में 18 और नए कोयला खदान केंद्र सरकार ने प्रस्तावित किया है। आलम यह है कि इन कोयला खदानों के चालू होने से 60 से अधिक आदिवासी अंचल का अस्तित्व खदान में समाहित होकर नक्से से विलुप्त हो जाएंगे। पर्यावरण के साथ मानव वन्य जीव प्रभावित होना तय है।

गौरतलब है कि जिले के अलग अलग हिस्से में 12 कोल माइंस संचालित है। इससे रायगढ़ खनन और औद्योगिक गतिविधियों का दबाव झेल रहा है। ऊर्जा के लिए सबसे बड़ा स्रोत कोयला है इसके लिए जिले में 18 नई कोल माइंस प्रस्तावित है। यह खदान आदिवासी अंचल धरमजयगढ़ में प्रस्तावित है। बताया जा रहा है कि इसके जद में 60 से अधिक गांव आ रहे है। इसे लेकर अभी से ग्रामीण जन विरोध का आंदोलन बुलंद कर रखे है। इसमें कमर्शियल खदान भी है। खदान से ऊर्जा और सरकार को राजस्व और रोजगार की उम्मीद है। जबकि दुष्प्रभाव के रूप में जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता प्रभावित होगा। आदिवासी और. ग्रामीण समुदाय इन प्रस्तावों को लेकर घर उजड़ने का भय, जमीन और माटी से दूर होने की चिंता सताने लगी हैं। उधर विस्थापन, मुआवजे और पुनर्वास के पुराने अनुभवों ने लोगों का भरोसा पहले ही कमजोर किया है। उधर, ग्राम सभाओं की सहमति और पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (ईआईए) की पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं। बहरहाल एक तरह औद्योगिक विकास से रोजगार और अन्य संसाधनों की पूर्ति के बीच नए कोयला खदान कितना असरकारक होगा औऱ ग्रामीण जन इसकी स्वीकृति वर्तमान परिदृश्य में किस स्तर में देते है। यह भी देखना कमोबेश जरूरी होगा।

धरमजयगढ़ के इलाकों में खुलना है माइंस

जिले में प्रस्तावित कोल माइंस में बायसी, चैनपुर, छाल, फतेहपुर, फतेहपुर ईस्ट, नवागांव ईस्ट, ओंगना पोटिया, रामनगर, तेंदूमुड़ी, वेस्ट ऑफ बायसी, कोयलार, नवागांव वेस्ट और बोजिया शामिल है। इन माइंस की नीलामी नहीं हुई है. जबकि दुर्गापुर-सरिया, दुर्गापुर-तराईमार (कर्नाटक पावर), शेरबंद, दुर्गापुर-शाहपुर (एसईसीएल), पुरुंगा (अडानी) भी प्रस्तावित है। इन कोल माइंस की नीलामी हो चुकी है।

पर्यावरण के साथ विस्थापन के पुराने अनुभव से अनुकूल माहौल

पर्यावरण के साथ जल जंगल जमीन के लिए हर स्तर में प्रदेश के विभिन्न हिस्से में आंदोलन हो रहा है।रायगढ़ जिला भी इससे अछूता नही है। इससे पहले मुड़ागांव महाजेंको प्रोजेक्ट का विरोध हुआ है। अब तमनार जिंदल कोल माइंस गारे पेलमा सेक्टर 1 के लिए जबरदस्त विरोध हो गया जो हिंसा तक उतपन्न कर दिया। प्रशासन ने निस्तारण के पत्र तक लिखा एवं उद्योग प्रबंधन ने भी इसी कदम ओर नजर आया। जानकारों के मुताबिक यह वर्तमान दृष्टिकोण में पर्यावरण के साथ जल जंगल जमीन का विनाश औऱ विस्थापन का दर्द है। ऐसे में इन विरोध के बीच खदान चालू करना चुनौती पूर्ण है।

मानव और वन्य जीव के बीच का सामंजस्य च्रक होगा प्रभावित

प्रस्तावित कोल माइंस घने जंगल, उपजाऊ कृषि भूमि और जल स्रोत के बीच है। खनन गतिविधियों से भूजल स्तर के गिरने, नदियों-नालों के प्रदूषित होने और खेतों की उत्पादकता घटने की आशंका है। जबकि कई रिपोर्ट इसे दर्शाते भी आए है। रायगढ़ के ग्रामीण इलाकों में पहले ही जल संकट गहराता जा रहा है। जंगलों के कटाव और खनन से हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर बाधित होने का अनुमान है। बीते कुछ वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं, जिनमें जनहानि और फसलों को नुकसान हुआ है।

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