नदी में बह रहा एसईसीएल छाल खदान का ओवरबर्डन, पर्यावरण विभाग की निगरानी कागजों तक सीमित
एनजीटी के निर्देशों के बावजूद नदी किनारे डंप हो रहा खदान का मलबा, बारिश के पानी के साथ महानदी की सहायक नदियों तक पहुंच रहा प्रदूषण
रायगढ़। कोयला खनन से निकलने वाला मलबा अब जिले की नदियों के लिए नई मुसीबत बनता जा रहा है। छाल स्थित एसईसीएल की कोयला खदान का ओवरबर्डन (खनन से निकली मिट्टी और पत्थर) नदी में बहने की शिकायत सामने आई है। नदी के किनारे जमा किए जा रहे इस मलबे का एक हिस्सा पानी के साथ बहकर नदी में पहुंच रहा है। इससे जल प्रदूषण का खतरा बढ़ने के साथ जलीय पारिस्थितिकी पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के निर्देशों के बावजूद यदि ऐसी स्थिति बनी हुई है, तो खदान प्रबंधन के साथ पर्यावरणीय निगरानी की व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
छाल क्षेत्र में कोयला खनन के दौरान बड़ी मात्रा में ओवरबर्डन निकलता है। इसके सुरक्षित निपटान के लिए निर्धारित स्थान और वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी है। इसके बावजूद नदी के आसपास मलबा जमा होने और उसके पानी में बहने की शिकायत गंभीर चिंता पैदा करती है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो नदी के जल की गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसका असर पड़ सकता है।
नदियों के संरक्षण का निर्देश, फिर भी नहीं थम रहा मलबा
पर्यावरण संरक्षण के लिए खनन कंपनियों को ओवरबर्डन के निस्तारण, जल निकासी और प्रदूषण नियंत्रण के स्पष्ट प्रावधानों का पालन करना होता है। नदी और जल स्रोतों को खनन अपशिष्ट से बचाने के लिए भी आवश्यक इंतजाम किए जाने चाहिए। इसके बावजूद छाल क्षेत्र में मलबे के नदी तक पहुंचने की शिकायत सामने आना प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। स्थानीय स्तर पर इस तरह की शिकायतों का समय पर निराकरण नहीं होने से समस्या बढ़ने की आशंका रहती है। जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर यह पता लगाए कि ओवरबर्डन कहां जमा किया जा रहा है और वहां से मलबा नदी तक कैसे पहुंच रहा है।
पर्यावरण विभाग की निगरानी कितनी प्रभावी, उठने लगे सवाल
औद्योगिक गतिविधियों और कोयला खदानों से होने वाले प्रदूषण पर नियंत्रण की जिम्मेदारी पर्यावरण विभाग की है। इसके लिए निरीक्षण, प्रदूषण की स्थिति का आकलन और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई जैसे प्रावधान हैं। लेकिन यदि नदी में खदान का मलबा पहुंच रहा है, तो यह जांच का विषय है कि निगरानी के दौरान इस स्थिति पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया। मामले में खदान प्रबंधन की जवाबदेही तय करने के साथ नदी के पानी की गुणवत्ता की जांच भी जरूरी है। यदि जांच में पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
केवल मलबा हटाना नहीं, स्थायी समाधान जरूरी
नदी में पहुंच चुके ओवरबर्डन को हटाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए खदान क्षेत्र में मलबे के सुरक्षित भंडारण, बारिश के पानी की निकासी और नदी की ओर होने वाले बहाव को रोकने के इंतजाम जरूरी हैं। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में खनन अपशिष्ट नदी तक न पहुंचे। एनजीटी के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित निरीक्षण और जिम्मेदारी तय करना जरूरी है। संबंधित विभाग को शिकायत की गंभीरता से जांच कर वस्तुस्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि खनन गतिविधियों के कारण नदी और पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।




