Friday, May 22, 2026
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मेडिकल कॉलेज में डायलिसिस सुविधा पर सवाल

मेडिकल कॉलेज में डायलिसिस सुविधा पर सवाल, बुजुर्ग मरीज को निजी अस्पताल का सहारा

ऑपरेटर नहीं होने का हवाला देकर लौटाने का आरोप

रायगढ़/ जिले में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। करोड़ों रुपये खर्च कर संचालित किए जा रहे मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थान में मरीजों को बुनियादी उपचार सुविधाएं तक समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। हालात ऐसे हैं कि गंभीर मरीजों को भी डायलिसिस जैसी आवश्यक सुविधा के लिए निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे मरीजों और उनके परिजनों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।

बीते दिनों ऐसा ही एक मामला सामने आया, जब नंदेली निवासी 75 वर्षीय बुजुर्ग को डायलिसिस के लिए जिला चिकित्सालय लाया गया। बताया जा रहा है कि बुजुर्ग की हालत गंभीर होने के कारण जिला चिकित्सालय से उसे मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। परिजन उम्मीद लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचे, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिल सकी। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन की ओर से ऑपरेटर उपलब्ध नहीं होने की बात कहते हुए मरीज को अन्यत्र इलाज कराने की सलाह दे दी गई।
सूत्रों की मानें तो मेडिकल कॉलेज में किडनी रोग विशेषज्ञ की कमी लंबे समय से बनी हुई है। यही वजह है कि कई बार डायलिसिस से जुड़े मरीजों को समुचित उपचार नहीं मिल पाता। जबकि मेडिकल कॉलेज जिले सहित आसपास के क्षेत्रों के हजारों मरीजों के लिए सबसे बड़ा सरकारी स्वास्थ्य केंद्र माना जाता है। इसके बावजूद आवश्यक विशेषज्ञ डॉक्टरों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी मरीजों के लिए परेशानी का कारण बन रही है।
परिजनों के अनुसार सरकारी अस्पतालों में भटकने के बाद मजबूरी में बुजुर्ग मरीज को निजी चिकित्सा संस्थान ले जाना पड़ा, जहां डॉक्टर रूपेंद्र पटेल के संस्थान में डायलिसिस कराया गया।

निजी संस्था महंगे उपचार
हर वर्ग निजी चिकित्सा संस्थानों उपचार कराने समर्थ नहीं हो पाता है।ऐसे में इस शासकीय चिकित्सा सुविधाएं ही इनका सहारा होती है।परन्तु जब इन सरकारी अस्पतालों में ही मरीज को उपचार न मिले तो क्या महंगा उपचार कराने वह सक्षम होगा।स्वास्थ्य सेवाओं की यह स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर तब हो जाती है, जब डायलिसिस, गंभीर ऑपरेशन, जैसी सुविधाएं लेकर उन्हें सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों से बैरंग लौटना पड़ता हैं। ऐसे मामलों में मरीज और उनके परिजन खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं, क्योंकि शासन द्वारा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यवस्थाएं अक्सर कमजोर नजर आती हैं।

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